वो 200 किलोमीटर BRM….और, कारवां बढता चला…..!

साइकिल चलाते हुए कुछ 90-95 किमी पूरे किये होंगे कि अचानक बायें पैर में तेज़ दर्द उठा. नसें खींच-सी रही थी. साथ चल रहे शरद जैन सर ने अचानक अपनी साइकिल रोकी और मेरे रुकने का कारण पूछा. मैंने बोला शायद “क्रेम्प्स” आया है. बोले, “वो तो रनिंग में आता है, बहुत दिन बाद साईकिल को हाथ लगाया है, इसलिए मसल-पेन होगा. रुको, आराम करो और निम्बाहेडा तक चलो…वहां फिजियोथेरेपिस्ट देख लेंगे.” निम्बाहेडा अभी 20-22 किलोमीटर दूर था… मन घबराया पर माना नहीं. जब 90 आ गए तो 20 क्या चीज़ है !

उदयपुर का यह पहला ऑफिशियल BRM ब्रेवेत इवेंट था. 200 किलोमीटर की राइड थी. व्हाट्सएप ग्रुप में रोज़ मैसेज चल रहे थे कि जल्दी से खुद को रजिस्टर करो. नयी नौकरी ज्वाइन किये अभी 1 महिना भी नहीं हुआ था, सो डर था कि उस वक़्त उदयपुर रहूँगा भी या नहीं. 10 दिसंबर रजिस्ट्रेशन की आखिरी तारीख थी. 08 को जीतू भैया ने लगभग डांट लगाते हुए रेग्युलर राइडर्स को जल्दी रजिस्ट्रेशन का मैसेज ग्रुप में डाला. मैंने शेड्यूल चेक किया तो राइड से एक दिन पहले यानि 15 दिसंबर शनिवार को नॉएडा ऑफिस में एक मीटिंग फिक्स थी. फोन करके रिपोर्टिंग ऑफिसर को रिक्वेस्ट किया कि मीटिंग सोमवार को कर लो तो उसने शनिवार दिल्ली आने का टिकट ही भेज दिया. अब क्या करता. सोचा, जो होगा देखा जायेगा, पहले रजिस्टर तो कर लूँ. प्रकाश को मैसेज किया और रजिस्ट्रेशन में मदद मांगी. भाई ने मदद की और रिप्लाई किया, “खुश हूँ कि तुम भाग ले रहे हो.”

15 को नॉएडा में मीटिंग को तय समय से पहले ख़त्म किया और रात की फ्लाइट से सीधे उदयपुर. 10 बज रहे थे. थकान हावी हो रही थी. घर आकर साइकिल को प्यार से देखा. लगभग 2 महीने से हमने एक दूजे की तरफ नज़र भी नहीं घुमाई थी. हाथ के स्पर्श से ही साईकिल ने मुझे रिटर्न स्माइल दी. जब दो प्यार मिलते हैं तो मन में हिलोर तो उठती ही है.

सुबह ठीक 5.45 बजे फतहसागर पहुँच गया. ठीक समय पर विधायक और मेयर सर ने झंडी दिखाकर रैली को रवाना किया. कारवाँ चल पड़ा. भटेवर में पहले चेक पॉइंट पर प्रकाश भाई हाथ में ज्यूस और सेंडविच लिए स्माइल दे रहा था. मेरे कार्ड पर सील लगी और पहिये फिर से तेज़ घूमने लगे. दूसरे चेक पॉइंट, मंगलवाड तक आते आते मुझसे केवल 2 साथी पीछे थे. अब तक लगभग 65 किलोमीटर पूरे हो चुके थे. वहां से आगे बढ़े और कुछ देर बाद पैर का दर्द मेरा मुंह चिढाने को सामने आ गया.

निम्बाहेडा पहुँचने वालो में मैं सबसे आखिरी था. नलवाया सर ने मेरे पैर को चेक किया. ट्रीटमेंट दिया और आराम करने को कहा. प्रकाश घबराया और एक बारगी बोला कि नहीं हो रहा हो तो ‘गिव अप” कर लो. अचानक जीतू भाई बोले, “भाई- चला लेगा, मैं जानता हूँ.” मेरा हौंसला बंधा. “मेवाड़ी रनर्स- निम्बाहेडा” के दीपेन्द्र सर ने फिर से पैर चेक किया और क्रेप बेंडेज जैसा एक पट्टा पैर पर चढ़ा दिया.

सभी को निम्बाहेडा से निकले आधा घंटा हो चुका था. पैर में दर्द अभी भी था. दीपेन्द्र सर बोले, आप कहो तो आपको मंगलवाड तक ड्राप कर दूँ ? मैंने उन्हें शुक्रिया कहा और साइकिल पर बैठ गया. निम्बाहेडा को टाटा कहने का वक़्त आ चुका था.
मंगलवाड से 7 किलोमीटर पहले प्रकाश ने फिर फोन किया और हौंसला बढ़ाया. कहा, “अभी खूब टाइम है. आराम से आओ. परेशां मत हो. अब ढलान ज्यादा है और मुझे पता है, तुम राइड पूरी करोगे.” सभी आगे निकल चुके थे और अब दर्द के साथ-साथ अकेले साईकिल चलाना भी भारी सा लग रहा था. पर रुकने की गुंजाइश नहीं थी. कुछ किलोमीटर चलता, थोडा आराम करता और चल पड़ता. एक दो जगह लेट कर नलवाया सर ने जो एक्सेरसाइज़ बताई थी, वो भी करता रहा.

सूरज घर जाने को निकल चुका था. एयरपोर्ट की चारदीवारी मेरे बायीं तरफ थी. अब उदयपुर केवल 20-22 किलोमीटर बचा था. स्त्रावा ने बताया कि मैं 190 किलोमीटर पूरे कर चुका हूँ. ख़ुशी हुई. पर जैसे ही थोडा आगे जिंक स्मेल्टर तक पहुंचा, अब दायें पैर में भी दर्द शुरू हो गया. शायद इसलिए कि काफी देर से पैडल की जिम्मेदारी बेचारे अकेले दायें पैर पर ही थी. सामने देबारी का घाटा दिखाई दे रहा था. दोनों पैरों में हिम्मत नहीं थी. साईकिल से उतरने के सिवा चारा नहीं था. पैदल चलने में भी दिक्कत हो रही थी, पर फिर भी धीरे धीरे चलकर “घाटा वाली माता” तक आया. सामने ढलान नज़र आई. साईकिल पर बैठ गया. वो बेचारी मेरा दर्द समझ रही थी. बिना कुछ बोले, आगे बढ़ चली.

अँधेरा घना होने जा रहा था. लाईट जलाई और धीरे धीरे आगे बढ़ता गया. अब तक मुझे साईकिल चलाते हुए 12 घंटे हो चुके थे. प्रताप नगर चौराहे पर पहुँच कर प्रकाश को फिर फोन लगाया. प्रकाश बोला, “भाई ! कोई कहीं नहीं गया है, सब तेरी राइड ख़त्म होने तक यही रुके हैं. तुम आओ.” चेहरे पर अनजानी सी मुस्कान आई. “मिल्खा” का वो सीन याद आया, जब वो नंगे ज़ख़्मी पैरों से भाग रहा था…. जोश आया….. पैडल जोर से लगने लगे. साईकिल में फिर से जवानी आ गयी थी. जो वहां से चली तो सीधे सेवाश्रम आखिरी रेखा पर आकर ही रुकी.

सबसे पहले कौन गले लगा और बधाई दी, याद नहीं पर हाँ, इतना याद था कि मेरा ग्रुप मेरे साथ था. मेरा “उदयपुर साइकिलिंग क्लब” मेरे साथ था. सारा दर्द जैसे अचानक गायब हो गया था. यहाँ सब अपने थे. जीतू भाई ने राइड ख़त्म होने के लिए एक छोटी ट्रीट ऑफर की. मुस्कुरा कर कहा, कल पार्टी करते हैं, अभी घर जाना है. मैडल… सर्टिफिकेट…फोटो… सब छोटे लग रहे थे. अगर सबसे बड़ा कुछ था तो वो क्लब का स्नेह था.

स्त्रावा चेक किया तो 210 किलोमीटर पूरे होने में 200 मीटर कम थे. अरे वाह… क्या सच में 200 किलोमीटर से ज्यादा चला ली ? शायद नहीं… क्योंकि वो 200 किलोमीटर कभी नहीं चला पाता, अगर सभी साथी वक़्त पर मेरी हौंसला अफजाई नहीं करते.. कभी 200 किलोमीटर नहीं सोच पाता, अगर उस दिन जीतू भाई ने व्हाट्सएप ग्रुप में प्यार भरी डांट नहीं लगाईं होती… 200 किलोमीटर का आंकड़ा हमेशा अधूरा ही रहता अगर प्रकाश ने पूरे वक़्त हाथ थामे नहीं रखा होता… 200 क्या 100 भी पूरे नहीं होते, अगर शरद जैन सर ठीक समय पर साईकिल रोककर साथ नहीं चले होते…. ये 200 किलोमीटर मेरे नहीं थे.. ये पूरे क्लब के थे… शुक्रिया साथियों… तुम्हारे बिना ख़्वाब- ख़्वाब ही रह जाता…

चलते चलते….

ये अलग बात है कि उस रात साले साहब (जो डॉक्टर भी हैं) ने बर्फ से सेक करवाया और रंग बिरंगी गोलियां खिलाई. मां ने उलाहना दिया कि ऐसी क्या मजबूरी थी जो ऐसे हाल में भी साईकिल चलाई… कही “परमानेंट डैमेज” हो जाता तो !! और तो और अगला पूरा दिन बिना काम के रजाई में बीता. पर हाँ, मैंने साईकिल को बता दिया कि अगली बार 300 किलोमीटर के लिए तैयार रहो… वो जोर से हंस पड़ी…..!

आर्य मनु की कलम से…!

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